2023 की यूपीयात्रा: सकारात्मकता के साथ नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ना।
2023 की यूपीयात्रा: सकारात्मकता के साथ नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ना।
कार्यालय पर्यटन 2023: मथुरा, वृंदावन, और आगरा यात्रा का सौंदर्य
2023 में हमारे कार्यालय कर्मचारियों की अद्भुत यात्रा का संक्षेप: मथुरा, वृंदावन, और आगरा के साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सैर का मजा लें। यात्रा ब्लॉग में अनुभव साझा करें और इन प्रमुख शहरों का मार्गदर्शन प्राप्त करें।
मेरी यह यात्रा शुरू होती है, सितम्बर २०२३ से । जब हमारे बॉस ने एक आम मीटिंग के लिए हम सभी स्टाफ वालो को बुलाया था। हम सभी को इस मीटिंग के बारे में अब तक कुछ नहीं पता था, की आज किस अहम् मुदे पर यह मीटिंग बलायी गयी हे। हम सभी के पास बॉस का सन्देश आते ही हम सभी एक साथ बॉस के केबीन मे जा पहुंचे सब के मन में एक की सवाल की आज ये मीटिंग किस लिए हे।
इससे पहले की हमारा ये सवाल हमे और परेशान करता बॉस ने मीटिंग का अहम मुद्दा हमारे सामने रखा। मुद्दा सुनते ही हम सब के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान आ गई मीटिंग का मुद्दा था कार्यालय की यात्रा जो हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी होने वाली थी। आपको थोड़ा और विस्तार से समझता हूँ हम सभी लोग एक प्राइवेट कम्पनी में काम करते हे। हमारा काम हे वेबसाइट को प्रमोट करना।
इस कार्यालय में मुझे काम करते हुए २०२३ तक ४ वर्ष हो गए हे। मेरे कार्यालय में कुल २७ लोग काम करते हैं। प्रत्येक वर्ष हमारे कार्यालय का वर्ष के अंतिम माह में एक और नई साल के सुरु होने से पहले ३१ दिसंबर को हमारे कार्यालय दवारा एक पार्टी का प्रोग्राम रखा जाता हे जिसमे प्रत्येक साल हम इस समय अलग-अलग गुमने के लिए जाते हे। नए साल के आने की खुसी मानते है।
इस वर्ष मेरे कार्यालय की तरफ से यात्रा को लेकर ही मीटिंग बुलाई गयी बॉस ने हम सभी से अपनी-अपनी राय पूछी की कार्यालय की यात्रा इस वर्ष कहा पर राखी जाये। तब सभी ने बॉस से एक सप्ताह का समय मांगा क्यों की यात्रा हमारे लिए बहुत की मजेदार होती हे इसलिए इतनी जल्दी से किसी जगह से चुनना मुश्किल था। बॉस ने सभी को एक सप्ताह का समय दिया।
पुरे सप्ताह सभी ने अपने मोबाइल और कंप्यूटर में खूब अच्छी-अच्छी जगह को चुन-चुन कर एक लिस्ट तैयार की एक सप्ताह समाप्त होने पर सोमवार के दिन हमारी फिर से मीटिंग शुरू हुई। सभी ने अपनी-अपनी लिस्ट के अनुसार बॉस को अच्छी-अच्छी जगह के बारे में बताया की इस वर्ष कार्यालय की यात्रा यहाँ पर करनी चाहिए ?
जिसमे से १ नंबर पर पंजाब था , २ नंबर पर उत्तर प्रदेश था, ३ नंबर पर राजस्थान का जयपुर जिला था। सभी ने इन तीन जगह पर जाने का मन बनाया। १ घंटे चली मीटिंग के बाद लास्ट में उत्तर प्रदेश को चुना गया। इस वर्ष का नए साल का उत्सव हम उत्तर प्रदेश में मनाएंगे। सब लोग बहुत खुश थे। बॉस ने सभी के आधार कार्ड मांगे जिसे की ट्रैन की टिकिट बूक कर सके।
सभी ने अपने-अपने आधार कार्ड दिए शाम तक सभी के ट्रैन के २८ दिसंबर २०२३ के ३र्ड AC के उत्तर प्रदेश के लिए टिकिट बुक हो गए। सभी लोगो के पास अब तीन माह का समय था। पर ये तीन माह सबके लिए बहुत ही मुश्किल और मजेदार जाने वाले थे। मुश्किल इसलिए क्यों की इंतज़ार की घंडिया लम्बी होती हे और मजेदार इसलिए क्यों की यात्रा पर जाने का सबके मन में आनंद का भाव।
टिकट बुक होते ही सब बहुत खुश हुए, अब सबके पास में ३ माह का समय शेष रहा था. सभी अपनी - अपनी यात्रा को लेकर तैयारी करने लगे। जैसे - जैसे दिन बीत रहे थे वेसे - वैसे सबके मन में यात्रा को लेकर और आनंद का भाव बढ़ने लगा था। सभी लोग अपनी यात्रा को लेकर बहुत ही उत्साहित थे। सभी लोग यात्रा पर जाने की तैयारी पूरी करने में लगे हुए थे। कोई नए कपड़ें ला रहा था, तो कोई नए जूते ला रहे थे। इन सब में, मैं भी पीछे नहीं रहा था मेने भी थोड़ी बहुत ख़रीदारी कर ली थी। प्रत्येक रविवार को सब कही न कही खरीदारी के लिए जाते थे। हर दिन यात्रा को लेकर पुरे कार्यालय में चर्चा चल रही थी।
हमारे कार्यालय कर्मचारियों के साथ सांस्कृतिक अनुभवों का सारांश
जिस दिन का इंतजार था आख़िरकार वो दिन आ ही गया २८ दिसम्बर को हमे आदे दिन के लिए कार्यालय बुलाया गया था। क्योकि काम भी आगे भेजना था हम सब ने जल्दी से काम अपना अपना काम ख़तम कर दिया अब घडी में १ बज गए थे। बॉस ने सबको बोला की अब सब अपने अपने घर चले जाओ शाम को हम सब ८ बजे चण्डावल में मिलते हे तो आप सभी समय पर पहुंच जाना। इस दिन हमारी ट्रैन ब्यावर से रात्रि ११ बजे थी। चंडावल से ब्यावर की दुरी ५७ किलोमीटर है बस से जाने में कम से कम १ घण्टे का समय लगता है। सब लोग अपने अपने घर चले। में भी अपने घर चला गया था। घर पर जाकर मेने थोड़ा रेस्ट किया उसके बाद खाना खाया फिर कुछ देर धुप में बैठा। अब मुझे चेहरे की मसाज करनी थी जिसके लिए में गर पर एलोवेरा का जेल तैयार कर रखा था उसमे थोड़ा सा नारियल तेल मिलाकर चेहरे और बालो की अच्छे से मसाज की फिर मेने अपना बेग तैयार किया जिसमे मेने मेरी जरूरत की सभी चीजे एक लिस्ट में लिख रखी उसके अनुसार मेने अपना बैग तैयार कर लिया अब गाड़ी में ४ बज गए थे। और मेरी माता जी का काम से आने का समय हो गया था। कुछ ही समय में मेरे माता जी भी आ गए उनके आते ही मेने चाय बनाई उनको भी पिलाई और मेने भी पिली। अब मुझे मेरे एक जोड़ी कपडे के जो में यहाँ से पहन कर जाने वाला हु उसके इस्त्री भी करनी है मेने जल्दी से कार्य को भी समाप्त कर लिया। अब बारी थी तो बस स्नान कर के तैयार होने की मेने सभी जरुरी कार्य को पूरा कर लिया। अब तक घड़ी में ६ बज गए थे और गांव में मेरी बस आने में १ घंटा शेष रहा था। अब तक मेरे गर पर खाना भी बन गया था। हम सब लोग साथ खाना खा रहे थे तभी मेरी माता जी ने पूछा कितने दिन लगेंगे वह पर वापिस कब आओगे मेने बताया में १ जनवरी २०२४ को सुबह तक आ जाऊंगा। उनका मेरे बिना मन नहीं लगता और ना मेरे उनके बिना। अब मेरे मेरा खाना पूरा नहीं हुआ उस से पहले मेरे सहकर्मी और अजीज मित्र मनीष का फोन आ गया कि आ जल्दी आ जाओ बस स्टॉप बस आने में बहुत कम समय रहा है मेने बोला हां आ ही रहा हूँ।
अब घडी में ६:४५ बज रहे थे। घर पर सभी बड़ो को प्रणाम कर के अब में नीकल गया बस स्टॉप की तरफ मेरे बड़े भैया ने मुझे बाइक से बस स्टॉप तक छोड़ दिया था। मेरे वह से पहुंचने से पहले ही मेरे कुछ मित्र वह आ गए थे। सब से मिलकर बहुत खुसी हुई की आज हमारे तीन महीनो का इंतजार ख़त्म होने वाला है। ७ बजते ही हमारी बस आ गयी हम सब बस में बेठ गए थे।
मेरे गांव से चण्डावल का रास्ता १५ मिनट का है। १५ मिनट बाद हम सब लोग चण्डावल पहुंच गए जहा हमारे कुछ साथी हमारा इंतजार कर रहे थे। कुछ ही समय में हमारे सभी साथी और बॉस चण्डावल आ पहुचे थे ३० मिनट के बाद हम सभी को ब्यावर जाने के लिए सरकारी बस मिल गयी। मेरे कुछ साथी को यात्रा के दौरान उलटी होने की दिक्क़त है उनके लिए फल के ठेले से कुछ संतरे और निम्बू भी ले लिए थे।
बस में बैठे बैठे सब लोग यात्रा को लेकर ही बाते कर रहे थे। इस दिन सर्दी भी बहुत तेज़ थी। और ऊपर से रात का समय था। १ घंटे बाद हम सभी ब्यावर पहुंच गए थे। ब्यावर बस स्टॉप से रेलवे स्टेशन की दुरी डेढ किलोमीटर की है। हम सबने पैदल ही वह था जाने का प्लान किया। तभी बॉस ने बोला सर्दी बहुत तेज़ है तो सब लोग चाय पी लेते है।
चाय पिने के लिए हम सब लोग बस स्टॉप पर एक प्रसिद्ध चाय की दुकान पर रुके थे। चाय की दुकान का नाम मंगल चाय था, वो बहुत ही संदर चाय बनाता था। उसके दुकान के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ था जिस पर चाय के पैसे लिखे हुए थे। जबकि जो पैसे उस बोर्ड पर लिखे हुए थे वो उससे काम पैसे में ही चाय दे रहा था।
इस बात का पता मुझे तब चला जब चाय पिने के बाद मेने उसे बोर्ड पर लिखे पैसे के अनुसार पैसे दिए ओर उसने कुछ पैसे मुझे वापिस दिए में समझा नहीं तब पूछने पर पता चला की एक चाय के केवल १० रूपये ही है। चाय पिने के बाद सब लोग रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ गए। रेलवे स्टेशन पहुंचने पर वहा रेलवे द्वारा लगाए गए निर्देशन बोर्ड को देखने पर पता चल की हमारी रेलगाड़ी २ घंटे देरी से रही है। सब का मन थोड़ा उदास हुआ क्योंकी एक तो शर्दी बहुत तेज थी और ऊपर से रेलगाड़ी २ घंटे लेट थी।
अब सब यही सोच रहे थे की ये २ घंटे यहाँ कैसे गुजरे जाये। सभी से अपना अपना सामान नीचे रखा और बैठ गए कुछ देर गपसप करने के बाद सब को थोड़ी थोड़ी भूख लग गयी सब ने रेलवे स्टेशन खड़े ठेले से कुछ नास्ता किया फिर वापिस आकर और बाते की सब अपने अपने फ़ोन में रेलगाड़ी की वर्तमान स्थिति देख रहे थे। सभी स्टाफ वालो को बॉस ने निर्देह दिए की रेलगाड़ी आने पर सावधानी से चढ़ना है सभी की शीट पास पास ही थी। तो जयादा कोई चिंता करने की बात नहीं थी। अब जिसका इंतजार था वो आ ही गयी। सब ने अपना अपना सामान उठाया और रेलगाड़ी की तरफ बढ़े कुछ ही समय में सब को अपनी अपनी शीट मिल गई। सभी ने अपना सामान सावधानी से रख कर सोने का विचार किया। सब लोगों ने अपने - अपने फ़ोन में सुबह ४ बजे का अलार्म लगाया और आराम से सो गए ट्रैन का देरी से आने की वजह से अब हम लोग आगे भी देरी से पहुँचने वाले थे। जहा पर हम लोग सुबह ४ बजे उतरने वाले थे अब हम वह ८ बजे पहुंचने वाले थे पर अब हमे आगरा नहीं भरतपुर उतरना था तो हमारे ४ बजे के अलार्म का काम पहले ही ख़तम हो गया था हम सबको बॉस ने ४ बजे से पहले उठा दिया था अब सब लोग अपने अपने फ़ोन में हमारे आने वाले स्टेशन भरतपुर की वर्तमान स्थित देख रहे थे।
सोचा कुछ और था, पर हुआ कुछ और सबका मन था ट्रेन में कुछ मस्ती करेंगे जैसे - गेम खेलना, अंतराक्षि करना, आदि पर ट्रेन के देरी से आने की वजह से सब प्लान बदल गया था। सुबह 8 बजे हमे आगरा उतरना था पर पता चला की शुक्रवार होने की वजह से ताजमहल कल के दिन बंद रहेगा तो ऐसे में आगरा उतरने का अब कैंसिल हो गया था। अब हम लोगो ने भरतपुर उतरने का मन बनाया ताकि आज के दिन वह गम के फिर आगे निकल जायेंगे। ट्रैन के देरी से आने की वजह से हमे बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। जब तक ट्रैन ने हमे भरतपुर पहुंचाया तब तक घड़ी में सुबह के ८ बज चुके थे।
तो अब इतना लेट होने की वजह से हमारे पास कम समय बचा था क्योंकी केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान गुमने में हमे कम से कम ६ घंटे लगने वाले थे उसके बाद हमे मथुरा के लिए निकला था। और इतना समय हमारे पास नहीं था।क्योंकी भरतपुर से मथुरा की दुरी 40.2 km थी। ६ घंटे गुमने के बाद मथुरा जाना मुश्किल लग रहा था। सबकी सहमति से हमने केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में गुमने का प्लान बदल दिया और चाय नास्ता करने के बाद मथुरा जाने ला सोचा सबने रेलवे स्टेशन के पास एक चाय की दुकान से चाय नास्ता तब तक बॉस ने ऑनलाइन एक मिनी बस और एक कार बुक करली जो हमे मथुरा लेके जाएगी। लोग बहुत जयादा थे तो एक बस में सबका बैठना मुश्किल है इस वजह से एक कार अलग से बुक करनी पड़ी थी। चाय पिने के बाद मेने घर पर फ़ोन किया और मेरी माता जी से बात की थी। बोलै की हम लोग अब भरतपुर पहुंचे है यहाँ से चाय नास्ता करने के बाद हम अब मथुरा के लिए निकल रहे है मेने फ़ोन नहीं रखें उससे पहले बस आ गयी थी सबने अपना अपना सामान उठाया और बस में बैठने लगे।
हमारे बॉस ने एक कार और एक मिनी बस बुक की थी, क्योंकि हम सभी लोग एक साथ एक ही बस में नहीं बैठ सकते थे। हमारी संख्या बहुत अधिक थी। अब हमारी बस भरतपुर से रवाना हुई। इस दिन बहुत जयादा कोहरा था इतना की ५०० मीटर दूर तक देख पाना भी संभव नहीं था। अब हमारी बस कुछ दूर चली ही थी की हमारे साथी महेंद्र जी तबियत कुछ खराब हो रही थी तबियत खराब होने का कारण था उनको यात्रा करते समय उल्टी होने की दिक्क्त थी। में और पियूष जी महेंद्र जी के पास वाली शीट पर ही बैठे थे उनकी तबियत खराब होते ही रमेश जी सर ने बस को साइड रोकने के लिए कहा और बस रुक गयी। महेंद्र जी अब बस से बहार उतरे और इनको बहुत तेज से उलटी होने लगी उनके साथ -साथ में और रमेश जी सर भी नीचे उतरे मेने सर ने उनके पीठ पर हाथ से सहलाया और पूछा की महेंद्र जी अब केसा महसूस कर रहे ही तभी मेने उनको थोड़ा पानी पिने के लिए बोतल आगे की उन्होंने पानी से मुँह धोया और थोड़ा पानी पिया अब उनको पूछने से पता चला की अब उनकी तबियत कुछ हद तक ठीक हे फिर हम सब वापिस बस में बैठे और बस को रवाना करवाया। मेरे पास वाली शीट पर मेरे साथी पियूष जी बैठे हे उनके पास कुछ आंवले की चॉक्लेट थी।
पियूष जी ने सभी को वो चॉक्लेट दी। अब हमारी बस फिर से मथुरा के लिए रवाना हो गयी थी। बस ड्राइवर बहुत ही अच्छे स्वाभाव के व्यक्ति थे। सब लोगो की फरमाइश पर उन्होंने बस में बहुत ही सुन्दर - सुन्दर गाने बजाये जिस से सब का मन खिल उठा और सफर बहुत सुहाना हो गया। कुछ घंटो बाद अब हम लोग मथुरा पहुंच गए।
बस ने हमे हमारे होटल पर छोड़ा सब लोगो ने अपना - अपना सामान लिया और होटल में प्रवेस किया होटल में ठहरने के हमारे बॉस ने रूम ऑनलाइन कुछ दिन पहले ही बुक कर लिए थे। कुछ ही समय में सब लोगो को अपने - अपने रूम मिल गए सब लोग अपने - अपने कमरों में चले गए सफर की वजह से सब लोग थोड़े थक से गए थे। सब लोगो ने कुछ ही समय में दैनिक कार्य से निवृत होकर वापिस होटल के रेस्टोरेन्ट में आये जहा पर हम सब लोगो के लिए खाने की व्यवस्था की हुई थी।
सब लोगो ने आराम से भोजन किया। भोजन करने के बाद अब हम सब लोगो ने गुमने जाने का मन बनाया। बॉस ने होटल मैनेजर से बात करके पता किया की इस समय मथुरा में कहा पर गुमने जाना सही रहेगा। होटल मैनेजर ने हमारी होटल से कुछ दूर एक जगह बताई जिसका नाम था, गोकुल।
मथुरा, वृंदावन, और आगरा में छुपे हुए रत्नों की खोज
मथुरा यात्रा के महत्वपूर्ण स्थल
गोकुल
गोकुल आगरा से एक छोटा लेकिन अद्भुत शहर है, जो मथुरा से लगभग 15 किमी दक्षिण-पूर्व में यमुना के तट पर स्थित है। मथुरा से 16 किलोमीटर दूर यह स्थान है जहां भगवान कृष्ण का पालन-पोषण उनकी दत्तक मां यशोदा ने गुप्त रूप से किया था। गोकुल एक सुरम्य शहर है जो अपने शानदार स्थानों, संरचनाओं, मंदिरों और विशेषताओं के साथ भगवान कृष्ण के बचपन के बारे में आकर्षक पौराणिक कहानियाँ पेश करता है। गोकुलनाथ मंदिर और रमणरेती दो दर्शनीय स्थान हैं जिनकी पवित्र रेत (रेती) को बीते समय की कहानियों से सजाया गया है जब भगवान कृष्ण अक्सर अपने भाई बलराम और अपने चरवाहे दोस्तों के साथ दिव्य लीलाओं (रमन) में शामिल होने के लिए यहां आते थे। इन दिनों, कई तीर्थयात्री भगवान कृष्ण का आशीर्वाद पाने के लिए रेत में लोटते हैं।
गोकुल के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करें:
गोकुल में घूमने लायक स्थान।
श्री ठकुरानी घाट
ठकुरानी घाट गोकुल का प्रसिद्ध घाट है। ऐसा माना जाता है कि वल्लभाचार्य (वलाहा वंश के संस्थापक) को जलमार्ग की देवी यमुना के दिव्य दर्शन हुए थे।
भगवान कृष्ण से प्रेरित होकर भक्त और लोगों को प्रेम और भक्ति के बारे में जानकारी देने के लिए गोकुल आए। वह गोकुल के शांतिपूर्ण परिवेश और धार्मिक स्थिति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी गहरी जड़ें भगवान कृष्ण और अपनी संपत्ति को छोड़कर हमेशा के लिए वहीं रहने का फैसला किया।
यदि आप इस रहस्यमय क्षेत्र में कदम उठा रहे हैं तो इस प्रसिद्ध मंदिर की यात्रा आपके यात्रा कार्यक्रम पर होनी चाहिए।
रमन रेती मथुरा से कुछ किलोमीटर दूर गोकुल में स्थित यह रमन वान या रमन रेती नामक एक अविश्वसनीय जगह है, जिसका पवित्र रेत (रेती ) एक पूर्व युग की कहानियों के साथ फिर से उभर रहा है जब भगवान कृष्ण ने दिव्य नाटकों (रमन) में शामिल होने के लिए बार-बार भाग लिया भाई, बलराम और उनके दोस्तों के साथ। वृंदावन की यात्रा शुरू करने से पहले यह वह स्थान भी है जहां उन्होंने अपने प्यार, राधा से मिलने के लिए चुना था। रमन रेती आज एक विशाल परिसर में फैला हुआ एक विशाल रेत का मैदान है जो एक हिरण अभयारण्य, कुछ खूबसूरत मंदिरों और तपस्या, संतों और तीर्थयात्रियों के लिए एक आरामदायक क्षेत्र है। सम्मान देने के अलावा, रमन रेती के रेत में भगवान कृष्ण के समय में खजाने के लिए जटिल परिसर में घूमने के लिए कुछ समय बिताएं। रमन रेती के लिए अभिशाप कृष्ण आश्रम, प्राचीन रमन बिहारीजी मंदिर के प्रसिद्ध आश्रम आवास हैं। 18 वीं शताब्दी के संत ज्ञानदासजी को समर्पित, मंदिर में भगवान कृष्ण के देवता को सटीक रूप में रखा गया था, जैसा कि संत को भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपने मजबूत तपस्या के लिए एक आशीर्वाद के रूप में प्रकट किया गया था।
नन्दभवन
नंद भवन का निर्माण 5000 वर्ष से भी पहले प्रसिद्ध वास्तुकार विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। यह पहाड़ी स्थान भगवान कृष्ण के संरक्षक नंद का निवास स्थान था। युवा कृष्ण और उनके छोटे भाई बलराम इसी घर में पले-बढ़े थे जबकि उनके माता-पिता वृन्दावन में कैद थे।
योगमाया यहाँ पाई जा सकती है। श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि पुत्र के रूप में पुत्र पाकर परम सुखी नंद बाबा कितने प्रसन्न हुए।
रमन रेती
1814 में बना द्वारकाधीश मंदिर मथुरा का प्रमुख मंदिर है। भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़े त्योहारों (जन्माष्टमी, होली और दिवाली) को मनाने के लिए सैकड़ों भक्त यहां आते हैं। दीवारों पर भगवान कृष्ण के रहस्यमय जीवन को दर्शाती खूबसूरत पेंटिंग्स टंगी हुई हैं। भक्तों और लोगों का मानना है कि भगवान कृष्ण अपनी किशोरावस्था के दौरान अपने भाई भगवान बलराम और अपने साथी अन्य गोपों के साथ इस स्थान पर खेला करते थे। अत: कृष्ण से संबंध होने के कारण अनेक धर्मात्मा लोगों ने इस भूमि का उपयोग अपने चिंतन-मनन के लिए किया। इस स्थान पर रंगबिहारी जी के नाम पर एक छोटा सा मंदिर है, जिसका निर्माण और पवित्रीकरण पवित्र संत श्री ज्ञान दास जी महाराज ने किया था, जिन्होंने इस पवित्र स्थान पर अपने उपवास के दौरान भगवान कृष्ण से दया मांगी थी, जिसके लिए रमन रेती ने प्रार्थना की थी। अत्यधिक सहनशक्ति दिखाई.
ब्रह्माण्ड घाट
ब्रह्माण्ड का अर्थ है ब्रह्माण्ड। यहां भगवान कृष्ण को अपनी अस्थायी मां यशोदा को संपूर्ण ब्रह्मांड अपने मुंह में दिखाना पसंद था।
कृष्ण के फूल खाने की हरकत से उनकी माँ यशोदा क्रोधित हो गईं और गोपों के साथ वहाँ गईं जहाँ कृष्ण खेल रहे थे। जब कृष्ण वहां पहुंचे, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि सभी गोप झूठ बोलते हैं और उन्होंने कभी फूल नहीं खाए हैं। इसे साबित करने के लिए यशोदा ने कृष्ण से अपना मुंह खोलने के लिए कहा। जब कृष्ण ने अपना छोटा सा मुंह खोला, तो माता यशोदा पूरे ब्रह्मांड को कृष्ण के मुंह में घूमता हुआ देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। कृष्ण के चेहरे पर ऐसा दृश्य देखकर वह सुध-बुध खो बैठे।
इस अव्यवस्था को देखते हुए इस घाट के किनारे ब्रह्माण्डबिहारी अभयारण्य नामक एक बड़ा अभयारण्य है।
गोकुलनाथ मंदिर
गोकुल नाथ मंदिर गोकुल में एक बहुत ही पवित्र स्थान है। कृष्ण जन्माष्टमी और अनाकोट त्योहारों के दौरान मंदिर में हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। अगर आपको भीड़-भाड़ पसंद नहीं है तो हमारी सलाह है कि आप इस दौरान वहां न जाएं। इस मंदिर में साल के किसी भी समय जाया जा सकता है।
गोकुल के सभी दर्शन जगह का आनंद लेने के बाद हम निकल पड़े बांके बिहारी मंदिर जो वह से २३ किलोमीटर की दुरी पर था। में और मेरे साथी पदम् जी और मनीष अब रिक्शा वालो से बात करने लगे एक तरफ बॉस ने हम तीनो को भेजा ओर दूसरी तरफ वो खुद रिक्शा वाले से बात करने लगे इस से ये होने वाला था की जो काम पैसे लेगा और तुरंत चलेगा उसे हम ले जायेंगे पर फिर वही समस्या की एक रिक्शे में हम सब लोग एक साथ बैठ नहीं सकते इसलिए कम से कम तीन रिक्शा किराये पर लेनी पड़ती थी।
रिक्शा वाले से में मारवड़ी भाषा में बात कर रहा था क्योंकी हम राजस्थानी थे और हम जिस क्षेत्र में रहते थे वहां मारवाड़ी भाषा ही बोली जाती थी मेरे साथी लोगो ने मुझे हिंदी भाषा में रिक्शा वाले से बात करने के लिए बोला पर बॉस ने मना कर दिया और बोला की आप मारवाड़ी भाषा में ही बात करो मारवाड़ी भाषा में बात करने से ये फायदा ये होने वाला था की वो पैसे के मामले में हम ठग नहीं सकते थे क्योकि मारवाड़ी लोग बहुत होसियार होते है और ये कैसे पता चलेगा की हम मारवाड़ी हे इसलिए मेने मारवाड़ी भाषा का उपयोग किया मारवाड़ी भाषा बहुत अच्छी और किसी भी माहौल में आनंद भाषा है। अब हम सब लोग रिक्शा में बैठ गए और बाकि बिहारी जी के मंदिर की और रवाना हो गए थे। एक रिक्शा में रिक्शा वाले के जस्ट पास में आगे वाली शीट पर बैठा था। और उनसे उत्तर प्रदेश की और वह गुमने लायक और जगह के बारे में पूछना लगा रिक्शा वाले भैया मेरी बातो से और मेरी भाषा से बहुत हसने लगे थे कुछ ही समय में वो हमारे साथ घुलमिल गए थे।
जो अच्छी बात थी रास्ते में बहुत से खेत आ रहे थे जिनमे कोई फसल बोई हुई थी पर हम में से किसी को समज नहीं आ रही थी की ये फसल किस चीज की हे इस बारे में मेने बिना रुके रिक्शा वाले भैया से पूछ लिया और भैया ने बताया की ये आलू की खेती की गयी है। इस बात को सुनते ही मेरे मित्र मनीष ने तुरंत ही मजाकिया मूड में बोला की तभी में सोचु की उप्र वाले सारे लोग पानी पूरी और चाट के ठेले ही क्यू लगते हे और साथ ही साथ उसने पूछ लिया की क्या यहाँ सब लोग आलू ही कहते हे इस बात पर सब जोर से हसने लगे। कुछ देर बाद हम अब वृन्दावन पहुंच गए रिक्शा वाले भैया ने हमे मंदिर से २ किलो मीटर पहले ही उतार दिया क्यू की आगे बाजार था और रिक्शा का आगे जाना संभव नहीं था।
हम सब लोग अब पैदल - पैदल बाजार के रास्ते से बांके बिहारी जी के मंदिर की तरफ जाने लगे रास्ता हम सब में से कोई नहीं जानता था लेकिन बाजार की दीवारों पर मदिर तक पहुंचे के लिए दिशा निर्देश लिखे हुए थे, जिससे की मंदिर तक पहुंचने में आसानी रहे है। मंदिर पहुंचने के बाद सब लोगो ने फूल और प्रशाद ली। मंदिर में बहुत अधिक भीड़ थी, हमने भी भीड़ के साथ साथ मंदिर में प्रवेश किया। बांकेबिहारी जी के मंदिर के पट खुलने ही वाले थे। हम सब लोग भी भगवान् के दर्शन के लाइन में खड़े हो गए थे। मंदिर के पट सिर्फ ५ मिनट के लिए खुले सबने भगवन के दर्शन किये और फूल माला अर्पित की अब मंदिर के पट वापिस बंद कर दिए गए थे हम सब लोगो ने परिक्रमा लगाई और भगवन के नाम का जैकारा लगया भगवान के दर्शन पाकर सब लोग अत्यंत खुश हो गए थे। अब बिना देरी किये हमे वह से आगे भी जाना था। वापिस वही बाजार वाले रास्ते से जिधर से आये थे उधर ही पैदल रवाना हो गए वापिस आते समय रास्ते में यमुना जी के दर्शन के लिए घाट पर गए वह पर कुछ नाव भी थी जिसमे बैठ कर आप यमुना जी घूम सकते हो।
